यूं लग रहा है जैसे अंगुलियों की पोरों ने अब सांस लेना बंद कर दिया है। तभी शायद कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। आंखों के सामने कितने ही रिश्ते 'विदा' हुए, मगर आंखों में जमा नीर कभी नहीं छलका। मेरे दर्द ने सिखाया था अंगुलियों को सांस लेना। आज उसी ने ही फिर से कुछ कहा है-
प्रीत भरे रिश्ते
कैसे भूलेगी वो घर और बाहर लगे नीम के उस पेड़ का गठजोड़।
कमर के बल सी मुड़ती गली का वो मोड़।
पिया से मिलन की खुशी है जेहन में,
मगर आंखों में टीस भी है इस घर से जुदा होने की,
जहां से शुरू हुआ था ख्वाबों का छोटा सा संसार।
आज सोचा है उसने कि अक्सर क्यों रोती है दुल्हन विदा होने पर।
परिवार के यादगार उपहार
मां-अनुभवी आंखों से देखता 'चश्मा' उसे सौंपा है, जीवन है नदी और तू इक नौका है। सुख-दुख तो जैसे दिन-रात है, संस्कारों की गठरी ही मां की सौगात है।
पिता-अंगुली पकड़कर चलना सीखी वालिद की, तब सीखी थी समाज के साथ कदमताल करना। विश्वास और 'मैं हूँ तो' ये एहसास, पिता का तोहफा है।
भाई-उसकी गुस्से से भरी डांट-डपट में भी प्यार की हूक, जैसे पुराने किसी जख्म पर भावना भरी फूँक। ऊपर से कठोर मगर मन में बेइंतहा प्यार है, यही भाई का उपहार है।
बहन-तेरी आंख के 'आईने' में ही देखकर संवरी हूं हरदम। याद आएगा वो रुलाना, रूठ जाना और फिर खुद ही मनाना। साथ ले जाना मत भूलना, यादों का ये नजराना।
...और मैं-शब्दों के जहां में नि:शब्द हूं मैं, चुप को सुनता हुआ। शायद घर के बाहर खड़े नीम के पेड़ की तरह। बस एक ही प्रश्न लिए कि जग की रीत है बहनों को विदा करना। वे ही क्यों घर छोड़कर पराई हो जाती हैं?
कैसे भूलेगी वो घर और बाहर लगे नीम के उस पेड़ का गठजोड़।
कमर के बल सी मुड़ती गली का वो मोड़।
पिया से मिलन की खुशी है जेहन में,
मगर आंखों में टीस भी है इस घर से जुदा होने की,
जहां से शुरू हुआ था ख्वाबों का छोटा सा संसार।
आज सोचा है उसने कि अक्सर क्यों रोती है दुल्हन विदा होने पर।
परिवार के यादगार उपहार

पिता-अंगुली पकड़कर चलना सीखी वालिद की, तब सीखी थी समाज के साथ कदमताल करना। विश्वास और 'मैं हूँ तो' ये एहसास, पिता का तोहफा है।
भाई-उसकी गुस्से से भरी डांट-डपट में भी प्यार की हूक, जैसे पुराने किसी जख्म पर भावना भरी फूँक। ऊपर से कठोर मगर मन में बेइंतहा प्यार है, यही भाई का उपहार है।
बहन-तेरी आंख के 'आईने' में ही देखकर संवरी हूं हरदम। याद आएगा वो रुलाना, रूठ जाना और फिर खुद ही मनाना। साथ ले जाना मत भूलना, यादों का ये नजराना।
...और मैं-शब्दों के जहां में नि:शब्द हूं मैं, चुप को सुनता हुआ। शायद घर के बाहर खड़े नीम के पेड़ की तरह। बस एक ही प्रश्न लिए कि जग की रीत है बहनों को विदा करना। वे ही क्यों घर छोड़कर पराई हो जाती हैं?
5 टिप्पणियां:
very nice areee tum to kavi ho gayee.... are bhi ab vo kavita ke bare main bhi bta do... jiske karaan tm kavi ho gye...
Kaash Main Bhi Etna Accha Likh Paata...So Nice
बेहद खूबसूरत प्रस्तुति। रिश्ते जितने प्यारे होते हैं, अभिव्यक्ति उतनी ही कलात्मक होती है। रिश्ते कविता बन जाते हैं और कविता नए रिश्ते बना देती है। एक नई कविता और एक नए रिश्ते के लिए बधाई हो।
really bhut achi poem likhi hain..........kabhi time mile to hum par bhi kuch likhna..........
very beautifully written truth in a poetic form.Keep writing dear friend.
vandana.
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